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शिमला की सर्द रात – Part 1

Hindi Stories·HI·5 min read·Published 2026-10-29, updated 2026-10-29·Part 1 of 2

बर्फ़ इतनी तेज़ी से गिर रही थी कि अनन्या को अपनी टैक्सी की हेडलाइट के आगे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।

“मैडम, आगे नहीं जा पाएँगे,” ड्राइवर ने गाड़ी रोकते हुए कहा। “कुफ़री वाली सड़क बंद हो गई है। पुलिस ने बैरियर लगा दिया है।”

“तो अब?”

ड्राइवर ने खिड़की से बाहर इशारा किया। सड़क के किनारे, देवदार के पेड़ों के बीच, एक पुराना लकड़ी का घर था। उसकी खिड़कियों में पीली रोशनी जल रही थी। बाहर एक छोटा-सा बोर्ड लटका था: हिमगिरि होमस्टे।

“रात यहीं रुक जाइए,” ड्राइवर ने कहा। “सुबह सड़क खुल जाएगी।”


दरवाज़ा एक बूढ़ी अम्मा ने खोला। सिर पर ऊनी टोपी, हाथ में लालटेन।

“आ जाओ बेटा, अंदर आ जाओ। बहुत ठंड है।”

अंदर एक बड़ा-सा कमरा था। बीच में अंगीठी जल रही थी। दीवारों पर पुरानी तस्वीरें टँगी थीं। और अंगीठी के पास, एक कुर्सी पर, किताब पढ़ता हुआ एक आदमी बैठा था।

उसने सिर उठाया। लंबा, गेहुँआ रंग, हल्की दाढ़ी, मोटा ऊनी स्वेटर। आँखें गहरी और शांत।

“एक और फँसा हुआ यात्री?” उसने मुस्कुराकर पूछा।

“लगता है,” अनन्या ने कहा।

“विक्रम,” उसने किताब बंद करते हुए कहा। “मुंबई से। मैं भी आज सुबह से यहीं फँसा हूँ।”

“अनन्या। दिल्ली।”

अम्मा ने अनन्या के हाथ में चाय का गिलास थमा दिया। अदरक और इलायची की खुशबू। फिर उन्होंने एक बात कही जिससे अनन्या का दिल धक् से रह गया।

“बेटा, एक ही कमरा बचा है। बाकी सब में पानी जम गया है। दोनों को बाँटना पड़ेगा।”


कमरा छोटा था। लकड़ी का फ़र्श, एक पुराना पलंग, एक छोटी-सी अंगीठी, और एक खिड़की जिसके बाहर बर्फ़ में डूबे पहाड़ चाँदनी में चमक रहे थे।

“मैं फ़र्श पर सो जाऊँगा,” विक्रम ने तुरंत कहा।

“फ़र्श बर्फ़ जैसा ठंडा है।”

“मैं मुंबई का हूँ। हमें ठंड से कोई फ़र्क नहीं पड़ता।”

“तुम काँप रहे हो,” अनन्या ने कहा।

विक्रम ने अपने हाथों की तरफ़ देखा। सच में काँप रहे थे। दोनों हँस पड़े।

उन्होंने अंगीठी के पास फ़र्श पर कंबल बिछाया और बैठ गए। अम्मा ने दो और गिलास चाय भेज दी, साथ में गरम पकौड़े।

“तुम शिमला क्यों आई?” विक्रम ने पूछा।

अनन्या ने चाय के गिलास को दोनों हाथों में पकड़ लिया।

“भागकर,” उसने कहा। “घर वाले शादी की बात कर रहे हैं। एक लड़का पसंद किया है। अच्छा लड़का है, अच्छी नौकरी है, सब कुछ ठीक है।” उसने कंधे उचकाए। “बस मुझे उससे कुछ महसूस नहीं होता।”

विक्रम कुछ देर चुप रहा।

“और तुम?” अनन्या ने पूछा।

“मैं भी भागकर।” वह मुस्कुराया, पर आँखें उदास थीं। “तीन साल एक ही दफ़्तर में, रोज़ चौदह घंटे। एक दिन सुबह उठा और समझ नहीं आया कि ज़िंदगी कहाँ गई। तो बैग उठाया और यहाँ आ गया।”

अंगीठी की आग चटकी। बाहर बर्फ़ गिरती रही, धीरे-धीरे, बिना आवाज़ के।


वे बहुत देर तक बातें करते रहे।

बचपन की, कॉलेज की, उन सपनों की जो रास्ते में कहीं छूट गए। विक्रम ने बताया कि वह कभी गिटार बजाता था। अनन्या ने बताया कि वह कभी कविताएँ लिखती थी। दोनों ने एक साथ कहा, “कभी,” और फिर हँस पड़े।

आधी रात को बिजली चली गई।

कमरे में सिर्फ़ अंगीठी की नारंगी रोशनी बची थी। ठंड अचानक और बढ़ गई। अनन्या ने कंबल अपने चारों तरफ़ और कसकर लपेट लिया।

“इधर आओ,” विक्रम ने धीरे से कहा। “दोनों के लिए एक कंबल काफ़ी है।”

वह हिचकिचाई। फिर खिसककर उसके पास आ गई। उसके कंधे से कंधा मिला। उसकी गर्माहट कंबल के अंदर तक पहुँच रही थी।

“अनन्या,” विक्रम ने कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। “एक बात कहूँ?”

“कहो।”

“जब तुम दरवाज़े से अंदर आई थी, बर्फ़ में भीगी हुई, तो मुझे लगा,” वह रुक गया।

“क्या लगा?”

“कि शायद मैं इसीलिए यहाँ फँसा हूँ।”

अनन्या ने उसकी तरफ़ देखा। आग की रोशनी में उसका चेहरा बहुत पास था। बहुत सच्चा।

उसने कुछ नहीं कहा। बस धीरे से आगे झुकी और उसे चूम लिया।

विक्रम एक पल के लिए स्थिर रहा, जैसे यक़ीन न हो रहा हो। फिर उसका हाथ उसके बालों में गया और उसने उसे वापस चूमा, धीरे और गहराई से, जैसे पूरी रात उनकी हो।

“क्या तुम्हें यक़ीन है?” उसने धीरे से पूछा।

“हाँ,” अनन्या ने कहा। “पहली बार किसी चीज़ का पूरा यक़ीन है।”

उसके बाद जो हुआ, वह सिर्फ़ उन दोनों का था: अंगीठी की आँच, खिड़की के बाहर चाँदनी में चमकती बर्फ़, और दो अजनबियों के बीच वह धीमी, गर्म नज़दीकी जो किसी से कही नहीं जा सकती। उस रात अनन्या ने पहली बार महसूस किया कि किसी के पास होने का मतलब क्या होता है।


सुबह धूप निकल आई थी।

पूरी घाटी सफ़ेद चादर में लिपटी थी। देवदार के पेड़ों पर बर्फ़ चमक रही थी। नीचे सड़क पर बर्फ़ हटाने वाली गाड़ी चल रही थी।

अम्मा ने नाश्ते में आलू के परांठे और मक्खन रखा। उन्होंने दोनों को एक साथ आते देखा, एक ही कंबल में लिपटे, और कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराकर एक और परांठा रख दिया।

“सड़क खुल गई है,” टैक्सी ड्राइवर ने बाहर से आवाज़ लगाई।

अनन्या ने विक्रम की तरफ़ देखा। विक्रम ने अनन्या की तरफ़।

“तो,” विक्रम ने कहा। “दिल्ली?”

“और तुम मुंबई।”

वह चुप रहा। फिर अपनी जेब से एक कागज़ निकाला। होमस्टे की पुरानी विज़िटर्स बुक का एक पन्ना, जो उसने रात को कहीं से फाड़ लिया था। उस पर कुछ लिखा था।

अनन्या ने पढ़ा। एक छोटी-सी कविता थी।

बर्फ़ ने रास्ते बंद किए, तो दिल का एक दरवाज़ा खुला। शायद हर सफ़र का मतलब, मंज़िल नहीं, वो मोड़ है जो मिला।

“तुमने लिखी?” उसने हैरानी से पूछा। “तुम तो गिटार बजाते थे।”

“कल रात तुमने कहा था तुम कविताएँ लिखती थी,” विक्रम ने कहा। “तो मैंने सोचा, कोशिश करता हूँ। बहुत बुरी है न?”

अनन्या की आँखें भर आईं। वह हँसी।

“बहुत बुरी है,” उसने कहा। “मुझे सिखानी पड़ेगी।”

“तो सिखाओगी?”

उसने कागज़ को मोड़कर अपनी जेब में रख लिया।

“मुंबई में बहुत बारिश होती है न?” उसने पूछा।

“बहुत।”

“तो वहाँ भी कोई सड़क बंद होगी,” अनन्या ने मुस्कुराकर कहा। “कभी न कभी।”

टैक्सी ड्राइवर ने हॉर्न बजाया। अनन्या ने उसे इशारा किया, पाँच मिनट।

वह पाँच मिनट एक घंटा बन गया।


अगला: भाग 2, मुंबई की बारिश। अनन्या मुंबई जाती है, और घर वालों को सच बताने का वक़्त आता है।

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