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शिमला की सर्द रात – Part 2: मुंबई की बारिश

Hindi Stories·HI·4 min read·Published 2026-10-29, updated 2026-10-29·Part 2 of 2

शिमला को छह महीने बीत गए थे।

छह महीने के वीडियो कॉल, रात दो बजे के मैसेज, और हर हफ़्ते एक नई कविता। विक्रम की कविताएँ अब भी बहुत बुरी थीं। अनन्या हर एक को सुधारकर वापस भेजती थी, लाल पेन से, जैसे स्कूल की टीचर हो। विक्रम हर बार जवाब देता: अगली बार बेहतर।

और हर बार अगली बार थोड़ी-सी बेहतर होती।

फिर जुलाई में, घर पर वो बात फिर शुरू हुई।

“रोहन के घर वाले अगले रविवार आ रहे हैं,” माँ ने खाने की मेज़ पर कहा। “सगाई की तारीख़ तय करने।”

अनन्या का चम्मच हाथ में रुक गया।

“माँ, मैंने हाँ नहीं कहा था।”

“तुमने ना भी नहीं कहा था,” पापा ने अख़बार के पीछे से कहा।

अनन्या ने कुछ नहीं कहा। उस रात उसने अपने कमरे में बैग पैक किया और सुबह छह बजे की फ़्लाइट से मुंबई चली गई।


मुंबई में बारिश हो रही थी।

ऐसी बारिश अनन्या ने कभी नहीं देखी थी। आसमान से पानी नहीं, पूरा समंदर गिर रहा था। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही वह पूरी भीग गई। सड़कों पर घुटनों तक पानी था। टैक्सियाँ रेंग रही थीं।

उसने विक्रम को नहीं बताया था कि वह आ रही है।

बांद्रा में उसकी बिल्डिंग के नीचे, एक चाय वाले की छोटी-सी टपरी के छज्जे के नीचे खड़ी होकर उसने फ़ोन मिलाया।

“हैलो?” विक्रम की आवाज़ नींद में थी। “अनन्या? इतनी सुबह?”

“तुम्हारी बिल्डिंग के नीचे जो चाय वाला है,” अनन्या ने कहा, “उसकी अदरक वाली चाय बहुत अच्छी है।”

फ़ोन पर एक लंबा सन्नाटा छा गया।

फिर उसे ऊपर किसी खिड़की के ज़ोर से खुलने की आवाज़ आई। उसने सिर उठाया। चौथी मंज़िल पर, बनियान और पजामे में, बाल बिखरे हुए, विक्रम खिड़की से आधा बाहर झुका हुआ था।

“वहीं रुको!” वह चिल्लाया। “हिलना मत!”

चाय वाले भैया हँस-हँसकर दोहरे हो गए।


वह नंगे पैर सीढ़ियों से भागता हुआ नीचे आया और बारिश में ही उसे बाहों में भर लिया। दोनों पूरी तरह भीग गए। चाय वाले भैया ने ताली बजाई। बिल्डिंग के वॉचमैन ने सीटी मारी।

“तुमने बताया क्यों नहीं?” विक्रम ने हाँफते हुए पूछा।

“क्योंकि मुझे तुम्हारा चेहरा देखना था,” अनन्या ने कहा।

फिर उसने बताया। रोहन के घर वाले। रविवार। सगाई की तारीख़।

विक्रम का चेहरा गंभीर हो गया।

“तो तुम भागकर आई हो,” उसने धीरे से कहा। “फिर से।”

अनन्या ने उसकी आँखों में देखा।

“नहीं,” उसने कहा। “इस बार मैं भागकर नहीं आई। इस बार मैं किसी के पास आई हूँ।”


उसका फ़्लैट छोटा था। किताबें, एक पुराना सोफ़ा, और कोने में एक गिटार, जिसकी धूल अब झड़ चुकी थी। खिड़की के बाहर बारिश की चादर में समंदर धुँधला दिख रहा था।

“तुमने फिर से बजाना शुरू किया?” अनन्या ने गिटार की तरफ़ देखकर पूछा।

“शिमला के बाद से रोज़,” विक्रम ने कहा। “और नौकरी छोड़ दी।”

“क्या?”

“तीन महीने पहले। तुम्हें नहीं बताया था, क्योंकि तुम डाँटती।” वह शरमाकर मुस्कुराया। “अब एक म्यूज़िक स्कूल में बच्चों को गिटार सिखाता हूँ। पैसे कम हैं। पर पहली बार सुबह उठने का मन करता है।”

अनन्या उसे देखती रही। फिर उसने गिटार उठाकर उसके हाथ में थमा दिया।

“सुनाओ,” उसने कहा।

विक्रम ने गिटार की तारें छेड़ीं। धीमी, सीधी-सादी धुन। फिर उसने गाना शुरू किया, अपनी ही लिखी हुई पंक्तियाँ।

पहाड़ों पर बर्फ़ गिरी थी, यहाँ बादल बरस रहे हैं, दो शहर, एक ही दिल, दोनों तुम्हें तरस रहे हैं।

अनन्या की आँखों से आँसू बहने लगे।

“ये भी बहुत बुरी है,” उसने रोते-रोते कहा।

“मुझे पता है,” विक्रम ने कहा। “सिखाओगी?”

उसने गिटार उसके हाथ से लेकर सोफ़े पर रख दिया और उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में ले लिया।

“पहले कुछ और सिखाती हूँ,” उसने धीरे से कहा।

उसके बाद जो हुआ, वह सिर्फ़ उन दोनों का था: खिड़की पर बरसती मुंबई की बारिश, धुँधला समंदर, और छह महीने की दूरी के बाद आख़िरकार एक-दूसरे के पास होने की वह गर्म, बेचैन ख़ुशी। शिमला की ठंडी रात की तरह ये भी एक कहानी थी, जो किसी और को कभी नहीं सुनाई जाएगी।


रविवार को अनन्या दिल्ली वापस गई। अकेली नहीं।

रोहन के घर वाले ड्राइंग रूम में बैठे थे जब दरवाज़े की घंटी बजी। माँ ने दरवाज़ा खोला। सामने अनन्या खड़ी थी, और उसके साथ एक लंबा, घबराया हुआ आदमी, हाथ में मिठाई का डिब्बा और पीठ पर गिटार।

“माँ,” अनन्या ने कहा। “ये विक्रम है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

उस दिन बहुत कुछ हुआ। पापा का चेहरा लाल हुआ। माँ रोईं। रोहन के घर वाले चुपचाप चले गए। रोहन ने, सच कहें तो, राहत की साँस ली और जाते-जाते अनन्या के कान में कहा, “मुझे भी किसी और से प्यार है। थैंक यू।”

शाम तक पापा ने विक्रम से एक शब्द नहीं कहा।

रात को खाने के बाद, बालकनी में, उन्होंने आख़िरकार पूछा, “गिटार बजाते हो?”

“जी, अंकल।”

पापा बहुत देर तक चुप रहे।

“मैं भी बजाता था,” उन्होंने धीरे से कहा। “तुम्हारी उम्र में। फिर नौकरी लग गई, शादी हो गई, बच्चे हो गए।” उन्होंने एक लंबी साँस ली। “कभी-कभी सोचता हूँ, छोड़ा क्यों।”

विक्रम ने कुछ नहीं कहा। बस गिटार उठाकर उनके हाथ में रख दिया।

पापा ने उसे ऐसे पकड़ा जैसे कोई पुराना दोस्त लौट आया हो।

अनन्या दरवाज़े पर खड़ी देखती रही। उसके पापा, जो तीस साल से अख़बार के पीछे छिपे रहते थे, बालकनी में बैठकर एक पुरानी धुन याद करने की कोशिश कर रहे थे। और विक्रम, धीरे-धीरे, उन्हें तार बता रहा था।


शादी अगले साल दिसंबर में हुई। शिमला में। उसी होमस्टे में।

अम्मा ने कहा था कि इतनी बर्फ़ में शादी करना पागलपन है। फिर उन्होंने सबके लिए आलू के परांठे बनाए और रो पड़ीं।

विदाई पर विक्रम ने एक कविता पढ़ी। अपनी लिखी हुई।

इस बार अनन्या ने उसे लाल पेन से नहीं सुधारा।

ये बहुत अच्छी थी।


समाप्त।

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